मैं मर जाता हुँ

*मैं मर जाता हूँ*



कोशिश तो बहुत करता हूँ कि तुमको प्यार करूं,
चाहूं इतना कि सारी हदे पार करूं!
पर उस एक नाम के आगे शिथिल पड़ जाता हूँ,
कैसे कहूं मैं कि जब लेती हो उसका नाम,
तो जिन्दा होते हुए भी मैं मर जाता हूँ !

माना कि बहुत प्यार दिया होगा उसने,
हो सकता है सबकुछ वार दिया होगा उसने,
पर मुझसा नहीं चाहेगा कोई तुमको,
यह एहसास भी दिलाया होगा उसने!
पर जब तोलती हो मेरी मोहब्बत को उसके लफ्जो से,
बोलना होता है बहुत कुछ, पर चुप हो जाता हुँ!
सच में! जिन्दा होते हुए भी मैं मर जाता हुँ!

न समझ पाई तुम कभी मेरी मोहब्बत को,
शायद कम था समय या मेरी सिद्द्त को!
तमन्ना थी बहुत कुछ कर गुजरने की तेरे वास्ते,
पर आज भी उससे मिलने की तेरी ख्वाहिश के आगे झुक जाता हुँ,
तेरी ख़ुशी के आगे अपनी मोहब्बत हार जाता हुँ,
सच में! जिन्दा होते हुए भी मैं मर जाता हुँ!

चलो आज तुमसे अलविदा कहते हैँ,
तुम रहो खुश उसकी यादों में यही दुआ करते हैँ!
वो तो हो गया किसी और का और तुम गम खाये बैठो हो!
वो नहीं है खुश अपनी जिंदगी में, यह गलतफ़हमी दिल से लगाए बैठे हो!
सोचता हूँ अब कि वापस लौट जाता हुँ,
कैसे कहूं मैं कि जब लेती हो उसका नाम,
सच में! जिन्दा होते हुए भी मैं मर जाता हुँ!

किसी रोज़ आएगी तुम्हें हमारी याद भी,
था कोई अपना जिसे नहीं समझ पाई आज भी!
फिर मिलेंगे किसी रोज़ जिंदगी के किसी मोड़ पर,
आज अपने प्यार को यहीं दफन किये जाता हूँ!
कैसे कहूं मैं कि जब लेती हो उसका नाम,
सच में! जिन्दा होते हुए भी मैं मर जाता हुँ!


✒️...............*हरी शंकर (नयन)*